Magadh Samrajya History In Hindi (मगध साम्राज्य)

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इसके साथ ही मगध साम्राज्य और उसके बाद में आने वाले मौर्य साम्राज्य और अन्य सभी प्रकार के महत्वपूर्ण साम्राज्य के बारे में भी बताया गया हे जिससे की आपको हर प्रकार से पढ़ाई करने में भी आसानी हो और आप सभी साम्राज्य के बारे में आराम से समझ सकते हो। हर प्रकार की सरकारी परीक्षा में जनरल क्नोलाज से संबधित प्र्शन पूछे जाते हे और उन परीक्षा में यह से महत्वपूर्ण प्र्शन पूछे जाते हे तो आप ध्यान से इन मगध साम्राज्य और मौर्य साम्राज्य के नोट्स को पढ़े और आराम से प्रश्नो का उत्तर दे।

मगध साम्राज्य के बारे में ( Magadh Samrajya History ) :-

‘मगध’ का सबसे पहले उल्लेख ‘अथर्ववेद’ में मिलता है। यह राज्य दक्षिण बिहार (वर्तमान पटना एवं गया) में विस्तृत था। इसकी प्रारम्भिक राजधानी राजगृह (गिरिव्रज) थी, जो बाद में पाटलिपुत्र स्थानान्तरित कर दी गई। छठी शताब्दी ई.पू. के लगभग मध्य में हर्यक वंश (544- 412 ई.पू.) द्वारा मगध महाजनपद का साम्राज्यिक विस्तार शुरू हुआ जो नागवंश (412 ई.पू.- 344 ई.पू.) एवं नंद वंश (344 ई.पू.- 322/321 ई.पू.) तक अबाध रूप से जारी रहा। उस समय संपूर्ण उत्तरी भारत में मगध एक विशाल साम्राज्य के रूप में स्थापित हुआ।

मगध साम्राज्य के प्रमुख शासक :-

• बिम्बिसार (544-492 ई. पू.): हर्यक वंश के संस्थापक जो बुद्ध एवं महावीर दोनों के समकालीन थे। इनकी राजधानी राजगृह थी, जिसका वास्तुकार महागोविन्द था। ‘जीवक’ इस काल का प्रसिद्ध वैद्य तथा ‘महागोविन्द’ प्रसिद्ध वास्तुकार था। बिम्बिसार को उनके पुत्र अजातशत्रु ने कैद कर लिया और 492 ई. पू. में उसकी मृत्यु हो गई।

• अजातशत्रु (492 – 460 ई. पू.): बचपन का नाम कुणीक । वह जैन व बौद्ध दोनों धर्मों का अनुयायी था। अजातशत्रतु के जीवनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना
वज्जिसंघ पर उसकी विजय थी। अजातशत्रु ने राजगृह में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया तथा बुद्ध के अवशेषों पर स्तूप का निर्माण करवाया। अजातशत्रु को ‘पितृहन्ता’ कहा गया है। अजातशत्रु की उसके पुत्र उदायिन द्वारा हत्या कर दी गई थी।

• उदायिन (460-444 ई. पू.): पाटलीपुत्र (गंगा और सोन नदी के संगम पर स्थित) राजधानी बनाई गई। जैन धर्म का अनुयायी। शिशुनाग (412 – 394 ई. पू.): शिशुनाग वंश का संस्थापक।

-हर्यक वंश के अन्तिम शासक नागदशक के शासनकाल में शिशुनाग एक आमात्य था एवं बनारस का गवर्नर था।
-मगध की राजधानी पुनः गिरिव्रज (राजगृह) बनाई गई। शिशुनाग ने वैशाली को मगध की दूसरी राजधानी बनाया।

• कालाशोक (394-366 ई. पू.): वैशाली के स्थान पर पाटलिपुत्र `को राजधानी बनाया गया। द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन करवाया। महापद्मनन्द (उग्रसेन): शिशुनाग वंश का अन्त करने वाला एवं नन्द वंश का संस्थापक। पुराणों में उसे ‘सर्वक्षत्रान्तक’ अर्थात् सब क्षत्रियों का नाश करने वाला तथा बौद्ध ग्रन्थों में उसे उग्रसेन अर्थात् ‘भयानक सेना का स्वामी’ कहा गया है।
• घननन्दः अन्तिम एवं सर्वाधिक प्रसिद्ध नन्द शासक जो सिकन्दर महान् का समकालीन था। इसी के शासनकाल में सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया था।

पारसिक (ईरानी) का आगम मगध साम्राज्य :-

ॐ डेरियस-I (Darius 1 : 522-486 ई. पू.): यह प्रथम ईरानी आक्रान्ता था। दारा (डेरियस-I) ने गन्धार, कम्बोज, पश्चिमी प्रान्त और पूरे सिन्ध प्रान्त पर अधिकार कर लिया था।
● सिकन्दर महान् (यूनानी आक्रान्ता): सिकन्दर मकदूनिया (मैसिडोनिया) के क्षत्रप फिलिप द्वितीय (359-336 ई. पू.) का पुत्र था। पिता की मृत्यु के बाद 20 वर्ष की आयु में वह राजा बना। सिकन्दर का जन्म 356 ई. पू. में हुआ।
● भारत विजय के लिए सिकन्दर बल्ख (बैक्ट्रिया) से चलकर काबुल के मुख्य मार्ग से होते हुए हिन्दुकुश पर्वत पार कर भारत आया। 327 ई. पूर्व में उसने भारत में प्रवेश किया।
• सिकन्दर के आक्रमण के समय पूर्वी गान्धार (राजधानी तक्षशिला) पर आम्भि का शासन था। आम्भि ने सिकन्दर से युद्ध के स्थान पर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।

यूनानी आक्रमण मगध साम्राज्य ( Magadh Samrajya History ) :-

• हाइडेस्पेस का युद्ध : यह युद्ध झेलम और चिनाब के मध्यवर्ती प्रदेश के राजा पोरस (पुरु) और सिकन्दर के मध्य झेलम नदी के पास हुआ, जिसमें भीषण युद्ध के पश्चात् सिकन्दर की विजय हुई। लेकिन जब पोरस को बन्दी बनाकर सिकन्दर के सामने लाया गया, तो सिकन्दर ने उनसे पूछा कि ‘बताओ तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाए।” तब पोरस ने गर्व से कहा “जैसा एक राजा दूसरे राजा से करता है।” पोरस के इस जवाब से प्रसन्न होकर सिकन्दर ने उसका राज्य वापस लौटा दिया।
• पोरस के विरुद्ध सफलता प्राप्त करने के पश्चात् सिकन्दर ने ‘निकैया’ (विजयनगर) और ‘बेऊकेफला’ नामक दो नगरों की स्थापना की। निकैया नगर की स्थापना विजय के उपलक्ष्य में की गई।

मौर्य साम्राज्य से पूर्व भारत पर मगध साम्राज्य का शासन था। इसका अंतिम शासक घननन्द था। यह सिकन्दर महान का समकालीन था। सिकन्दर के जाने के पश्चात् मगध साम्राज्य में अशान्ति व अव्यवस्था फैल गई थी। परिणामस्वरूप चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य (विष्णु गुप्त) की सहायता से मगध सत्ता पर अधिकार कर लिया व मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। चन्द्रगुप्त मौर्य ने धीरे-धीरे चाणक्य की सहायता से संपूर्ण भारत को राजनीतिक एकता के सूत्र में पिरोया। मौर्य साम्राज्य भारत का प्रथम व्यापक तथा भारतीय उपमहाद्वीप का विशालतम साम्राज्य था। मौर्य साम्राज्य हिन्दुकुश पर्वत से कावेरी नदी तक फैला था ।

मौर्यकाल में सर्वप्रथम सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की गई जिसे सम्राट अशोक ने “जीओ और जीने दो” के सिद्धान्त पर आगे बढ़ाया। मौर्यकालीन इतिहास को जानने हेतु साहित्य में पुराण, विशाखदत्त का ‘मुद्राराक्षस’ और कौटिल्य (चाणक्य) का ‘अर्थशास्त्र’ प्रमुख हैं। लौह विजय के सिद्धान्त का प्रतिपादन’कौटिल्य’ ने किया ।

● मेगस्थनीज व उसकी इंडिका- मेगस्थनीज यूनानी राजदूत था जिसे सेल्यूकस निकेटर ने चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा था। मेगस्थनीज लगभग 304 से 299 ई.पू. तक पाटलिपुत्र में रहा था। मेगस्थनीज की इंडिका हमें मूल रूप में उपलब्ध नहीं है। उसके अंश हमें यूनानी-रोमन लेखकों जस्टिन, प्लूटार्क, स्ट्रेबो, प्लिनी, एरियन की रचनाओं में मिलते है।

मौर्यकालीन शासक मगध साम्राज्य के बाद :-

चन्द्रगुप्त मौर्य (322-298 ई.पू.): चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म 345 ई. पू. में हुआ था।
● यूनानी लेखों में मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य के नाम के भिन्न-भिन्न रूपान्तर मिलते हैं। स्ट्रैबो, एरिअन और जस्टिन इसे ‘सैण्ड्रोकोट्स’ के नाम से पुकारते है। एपिअन और प्लूटार्क इसे ‘ऐण्ड्रोकोट्स’ के नाम से पुकारते हैं।
• चाणक्य ने 322 ई. पू. में चन्द्रगुप्त का राज्याभिषेक किया। चन्द्रगुप्त ने ‘राजकीलम’ खेल के माध्यम से तक्षशिला के आचार्य चाणक्य को प्रभावित किया था।
• यूनानी शासक सेल्युकस ने 305 ई. पू. में भारत पर आक्रमण किया था। इस आक्रमण में चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्युकस को पराजित किया था। चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्युकस निकेटर की पुत्री हेलन से विवाह किया।
• चन्द्रगुप्त मौर्य प्रथम शासक था जिसने नर्मदा नदी के दक्षिण में भी अपना विजय अभियान चलाया। पाटलिपुत्र चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्य की राजधानी थी।
• जैन परम्पराओं के अनुसार अपने जीवन के अन्तिम दिनों में वह जैन हो गया तथा भद्रबाहु की शिष्यता ग्रहण कर ली।

• चन्द्रगुप्त के शासनकाल के अन्त में मगध में 12 वर्षों का भीषण अकाल पड़ा। उसके पश्चात् वे भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला (मैसूर) में तपस्या करने चल गए। चंद्रगिरि पर्वत पर स्थित ‘चंद्रगुप्तवस्ति’ नामक मंदिर में उन्होंने 298 ई. पू. के लगभग सल्लेखना पद्धति द्वारा प्राण त्याग दिए।

• शक क्षत्रप रूद्रदामन के जूनागढ़ लेख में यह उल्लेख मिलता है कि इस क्षेत्र में चन्द्रगुप्त मौर्य ने पुष्यगुप्त वैश्य को राज्यपाल नियुक्त किया जिसने सौराष्ट्र के कृषकों को सिंचाई सुविधा देने के लिए सुदर्शन झील का निर्माण कराया।

बिन्दुसार (298-273 ई.पू.) मौर्यकालीन शासक:-

298 ई.पू. में चन्द्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र बिन्दुसार उसका उत्तराधिकारी बना। यूनानी लेखकों ने उसे’ अमित्रोकेडीज’ कहा है, जिसका संस्कृत रूपान्तरण ‘अमित्रघात’ (शत्रुहंता का शत्रुओं को नष्ट करने वाला) होता है।
• उसके शासनकाल के प्रारंभ में कौटिल्य (चाणक्य) और बाद में ‘खल्लाटक’ प्रधानमंत्री रहा।
• सीरिया के सम्राट एण्टियोकस प्रथम ने डायमेकस तथा मिस्र के शासक टॉलेमी फिलाडेल्फस ने डायोनियस को राजदूत के रूप में बिन्दुसार के राजदरबार में नियुक्त किया था।
● अशोक महान (273-232 ई.पू.): बिन्दुसार का पुत्र अशोक विश्व के महानतम सम्राटों में से एक था।
• राज्यारोहण से चार वर्ष के सत्ता संघर्ष के पश्चात् 269 ई. पू. में अशोक का औपचारिक राज्याभिषेक हुआ। अशोक ने 37 वर्ष तक शासन किया व उसकी मृत्यु 232 ई. पूर्व में हुई।

• उसके अभिलेखों में उसे देवानामप्रिय, देवनांप्रियदसि की उपाधियों से संबोधित किया गया है। मास्की, गुर्जरा, नेत्तुर तथा उद्यगोलम शिलालेखों में उसका नाम अशोक मिलता है। पुराणों में अशोक को अशोक वर्धन कहा गया है।

कलिंग का युद्ध :-

पूर्वी समुद्री तट पर बंगाल की खाड़ी के किनारे महानदी और गोदावरी नदियों के बीच के प्रदेश (उड़ीसा) को प्राचीन काल में कलिंग कहा गया है। अशोक ने अपने 261 में कलिंग का युद्ध किया था। कलिंग पर विजय के पश्चात् तोसली को इसकी राजधानी बनाया गया। कलिंग युद्ध
का अशोक के 13वें अभिलेख में वर्णन है।

• कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक ने युद्ध नीति को सदैव के लिए त्याग दिया तथा दिग्विजय (भेरी-घोष) के स्थान पर धम्म घोष (धम्म विजय) को अपनाया था।
• अपने शासन के प्रारम्भिक वर्षों में अशोक ब्राह्मण धर्म का अनुयायी व शिव का उपासक था। कलिंग युद्ध के बाद वह बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया। अशोक को बौद्ध भिक्षु उपगुप्त ने बौद्धधर्म में दीक्षित किया। अशोक के बुद्ध, धम्म व संघ का अभिवादन भाब्रू से प्राप्त लघु शिलालेख में होता है। इस में अशोक ने ‘त्रिरत्न’ में आस्था प्रकट की है।
• अशोक का साम्राज्य विस्तार- उत्तर-पश्चिम में हिन्दुकुश, उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में मैसूर तक, पश्चिम में सौराष्ट्र और सोपारा से लेकर पूर्व में बंगाल तक।
• अशोक का धम्म- अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए अशोक ने जिन आचारों की संहिता प्रस्तुत की उसे उसके अभिलेखों में ‘धम्म’ कहा गया है। अशोक ने धम्म विजय की चर्चा अपने 13वें शिलालेख में की है। वस्तुत: अशोक भारतीय इतिहास में प्रथम शासक था, जिसने राजनीतिक जीवन में हिंसा के त्याग का सिद्धान्त सामने रखा।

• अशोक द्वारा धम्म प्रचार हेतु निम्न कार्य करवाये गये- धम्म यात्राओं का प्रारम्भ। अपने राजकीय अधिकारियों-राज्जुक, प्रादेशिक व युक्त को जनता के बीच जाकर धर्म के प्रचार व उपदेश करने का आदेश दिया। अशोक ने धर्म की एकता स्थापित करने के लिए धर्म महामात्रों की नियुक्ति की।
• अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र व पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु श्रीलंका भेजा।
● अशोक ने पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगति (250 ई. पू.) का आयोजन किया जिसके अध्यक्ष मोगलुिपत्ततिस्स थे। इस संगति में बौद्ध ग्रंथों का अंतिम रूप से सम्पादन किया गया व तीसरा पिटक अभिधम्म पिटक जोड़ा गया। तीनों पिटकों को ‘त्रिपिटक’ के नाम से संबोधित किया गया। इस संगीति के बाद बौद्ध धर्म के भारत से बाहर प्रचार-प्रसार की प्रक्रिया आरम्भ हुई।
• ‘राजतरंगिणी’ के अनुसार अशोक ने श्रीनगर व देवपाटन नगरों की स्थापना करवाई।
• अशोक की मृत्यु 232 ई. पू. में हुई। अशोक की मृत्यु के बाद से मौर्य साम्राज्य के पतन की क्रिया आरम्भ हो गई।

प्रशासन में अशोक द्वारा सुधारः-

अशोक ने प्रशासन को ‘पितृ सिद्धान्त’ से जोड़ दिया तथा अपने धौली अभिलेख में घोषित किया कि ‘सारी प्रजा मेरी संतान’ है तथा उसके सुख-दुख की चिंता तथा निवारण सरकार का दायित्व है। अशोक के अभिलेख व शिलालेखः अभी तक अशोक के 47 से अधिक स्थलों पर अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनकी संख्या 150 से ज्यादा है। ये अभिलेख राजकीय आदेश के रूप में जारी किए गए थे। अशोक के अधिकांश अभिलेख ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा में प्राप्त होते हैं। सामान्यतः अशोक के अभिलेखों में तीन लिपियों का प्रयोग किया गया है। ये लिपियाँ हैं-
1. ब्राह्मी लिपि
2. खरोष्ठी लिपि- मनसेरा (हजारा-पाकिस्तान) ओर शाहबाज़गढ़ी (पेशावर-पाकिस्तान) अभिलेखों में प्राप्त । यह लिपि दाईं से बाईं ओर लिखी जाती है।
3. ग्रीक (यूनानी) एवं अरामाइक लिपि- ‘शार-ए-कुजा अभिलेख- द्विभाषीय अभिलेख है। काबुल नदी के किनारे जलालाबाद के पास से प्राप्त लमघान शिलालेख अरामाइक लिपि का महत्वपूर्ण शिलालेख है।’

अशोक के अभिलेखों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) शिलालेख
(2) लघु शिलालेख
(3) स्तम्भ लेख
(4) लघु स्तम्भ लेख

(5) गुहालेख ।

● शिलालेख: ये पहाड़ों की शिलाओं पर लिखित अभिलेख है। ये निम्न है-
• वृहद शिलालेखः ये 14 विभिन्न लेखों के समूह हैं जो 8 स्थानों पर प्राप्त हुये हैं। शाहबाजगढ़ी व मनसेहरा (पाकिस्तान), कालसी (उत्तराखण्ड), गिरनार (गुजरात), धौली व जोगढ़ (उड़ीसा), एर्रागुड़ी (आन्ध्रप्रदेश), सोपारा (महाराष्ट्र) ।
* पाँचवें अभिलेख में अशोक के राज्यारोहण के 13वें वर्ष के बाद धम्म महामात्र की नियुक्ति का उल्लेख है।
* आठवें शिलालेख में सम्राट अशोक द्वारा आखेटन का त्याग तथा धम्म यात्रा करने की सूचना दी गई है। दूसरे व ग्यारहवें शिलालेख में अशोक की धम्म नीति की व्याख्या की गई है।

* तेरहवाँ अभिलेख सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख है। इस अभिलेख में कलिंग विजय, उसके हृदय परिवर्तन तथा उसके द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने की सूचना मिलती है। इसमें युद्ध विजय के बदले धम्म विजय पर बल दिया गया है। इस अभिलेख से ही अशोक की विदेश नीति पर प्रकाश पड़ता है।

* लघु शिलालेख- अशोक के लघु शिलालेख विभिन्न क्षेत्रों जैसे- रूपनाथ, सासाराम, दिल्ली, गुर्जरा, भाब्रू (बैराठ), मास्की, ब्रह्मगिरी, सिद्धपुर, जटिंग रामेश्वर, एर्रागुड्डी, गोविमठ, पालकी गुण्डु, राजुल मंडगिरि तथा उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर में स्थित अहरौरा से प्राप्त हुए हैं। मास्की, गुर्जरा, उदयगोलम तथा नेट्टर (कर्नाटक) से प्राप्त शिलालेखों में अशोक को उसके व्यक्तिगत नाम से पुकारा गया है। मास्की शिलालेख में उसका नाम ‘अशोक देवानामप्रिय’ मिलता है। मास्की शिलालेख रायचूर (कर्नाटक) में स्थित है।

• स्तम्भ लेख- इन लेखों की संख्या 7 है जो छ: विभिन्न स्थानों पर मिले हैं। दिल्ली-टोपरा, दिल्ली-मेरठ, लौरिया अरेराज, लौरिया नंदनगढ़, रामपुरवा व प्रयाग (इलाहाबाद)। प्रयाग का शिलालेख पहले कौशाम्बी में था जिसे बाद में प्रयाग में लाया गया।

• लघु स्तंभलेख- अशोक के लघु स्तम्भ लेख निम्नांकित स्थानों पर स्थापित है- साँची, सारनाथ, कौशाम्बी, निगाली सागर (निग्लीवा, नेपाल), रुम्मिनदेई (नेपाल)। इन स्तम्भों पर राजकीय घोषणाएँ खुदी हुई है। कौशाम्बी के लघु स्तम्भ लेख में अशोक अपने महामात्रों को आदेश देता है कि वह संघ भेद को रोके। ‘रुम्मिनदेई’ स्तम्भ लेखों से ज्ञात होता है कि अशोक ने बुद्ध के जीवन से संबंधित पवित्र स्थानों की यात्रा की थी।

• गुहा अभिलेख- बिहार में गया के पास बाराबार की पहाड़ियों में अशोक के तीन गुफा लेख मिले है।

मौर्य साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण:-

• अशोक के उत्तराधिकारी योग्य नहीं थे। वे परिस्थितियों के अनुकूल नवीन नीति अख्तियार नहीं कर सके। परवर्ती मौर्यों के समय तेजी से शासक बदलने के कारण राजनीतिक व प्रशासनिक अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो गई।
● अशोक की धम्म नीति ने साम्राज्य के सैन्य आधार को कमजोर किया था ।

भारत में सर्वप्रथम दूसरी शताब्दी ई.पू. ग्रीक (यूनानी ) आये जो यूनानी (सेल्यूसिड) साम्राज्य के अधीन बैक्ट्रीया व पर्थिया पर शासन कर रहे थे। इनमें सर्वप्रथम आक्रमणकर्त्ता डिमेट्रियस-II था। डिमेट्रियस (190 ई. पू.-165 ई. पू.) ने पश्चिमोत्तर भारत में इण्डो-यूनानी सत्ता की स्थापना कर ‘साकल’ को अपने विजित क्षेत्र की राजधानी बनाया था। उस ने यूनानी और खरोष्ठी लिपि में अपने सिक्के चलाए थे। उस समय पुष्यमित्र शुंग मगध सम्राट था। नाट्य कला में यवनिका (पर्दा) शब्द ग्रीक परम्परा का प्रभाव है।

मिनेण्डर (155-130 ई. पू.) – इण्डो-यूनानी शासकों में मिनेण्डर का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है। मिनेण्डर का विवरण नागसेन कृत ‘मिलिन्दपन्हो’ व क्षेमेन्द्र कृत ‘अवदान कल्पलता’ में मिलता है। ‘मिलिन्दपन्हों’ में मिनेन्डर व बौद्धभिक्षु नागसेन के बीच संवाद का वर्णन है। वह बौद्ध अनुयायी हो गया था। शुंग वंशः मौर्य सेनानी पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य सम्राट वृहद्रथ को मारकर 185 ई. पू. में शुंग वंश की नींव डाली। पुष्यमित्र शुंग ने विदिशा को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। शुंग के राज्य की एक राजधानी पाटलिपुत्र थी। पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण-धर्म का अनुयायी था व बौद्ध धर्म का विरोधी था। उसने बौद्धों पर अत्यधिक अत्याचार किए।

● कण्व वंशः शुंग वंश का अन्तिम शासक देवभूति दुर्व्यसनी जनता में अलोकप्रिय था अतः उसके मन्त्री वासुदेव कण्व ने उसकी हत्या कर 73 ई. पू. में कण्व वंश की स्थापना की। इस वंश का अन्तिम शासक सुशर्मा था।

सातवाहन वंशः सातवाहन वंश का संस्थापक ‘सिमुक’ था। ‘सिमुक’ ने अन्तिम कण्व शासक सुशर्मा की हत्या कर 27 ई. पू. में इस वंश की स्थापना की। सिमुक, शातकर्णि प्रथम, गौतमी पुत्र शातकर्णि, तथा यज्ञश्री शातकर्णि इस वंश के प्रमुख शासक हुए। शातकर्णि प्रथम – यह सिमुक का पुत्र तथा प्रथम प्रतापी सातवाहन
शासक था। शातकर्णि के विषय में हाथीगुम्फा अभिलेख, साँची अभिलेख व नानाघाट अभिलेख से जानकारी प्राप्त होती है।

• हाल – हाल इस वंश का 17वाँ राजा था। यह एक शान्तिप्रिय शासकं व कवि था। उसने प्राकृत भाषा में ‘गाथा सप्तशती’ नामक काव्य ग्रन्थ की रचना की। उसकी राज्यसभा में ‘वृहत्कथा’ का रचयिता गुणाढ्य था।

• गौतमीपुत्र शातकर्णि- यह सातवाहन वंश का 23वाँ शासक था। वह एक अत्यन्त प्रतापी शासक था।

शक वंशः भारत में शकों का आगमन पूर्वी ईरान से हुआ था तथा उन्होंने पश्चिमोत्तर प्रदेशों में यवन-सत्ता को छिन्न-भिन्न कर अपने साम्राज्य की स्थापना की थी। तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र, उज्जयिनी आदि स्थानों में शकों के साम्राज्य की स्थापना हुई थी।

रुद्रदामन – शक वंश का प्रतापी शासक था, जो 145 ई. में सिंहासन पर बैठा। इसके इतिहास की जानकारी जूनागढ़ अभिलेख से प्राप्त होती है। रुद्रदामन ने सुदर्शन झील (जिसका निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य के गवर्नर पुष्यगुप्त वैश्य ने करवाया था) का जीर्णोद्धार कराया था। रुद्रदामन वैदिक धर्म का अनुयायी था और उसने संस्कृत भाषा को राज्याश्रय दिया था। गुप्तवंशीय शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शक शासक रुद्रसिंह तृतीय की हत्या कर शक राज्य को गुप्त साम्राज्य में विलीन कर दिया।

पहव (पार्थियन) वंश: पहव मूलत: पार्थिया (ईरान) के निवासी थे। पार्थियन साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मिथ्रेडेट्स था। भारत में पहला पहव शासक बोनोनीज (58-18 ई. पू.) था। पह्नव वंश का सबसे प्रतापी राजा गोंडोफरनीज था। कालान्तर में यू-ची जाति (कुषाण) के कबीलों ने भारतीय परिदृश्य से पार्थियन सत्ता को समाप्त कर दिया।

कुषाण वंशः कुषाण भी एक विदेशी जाति थी, जो चीन के पश्चिमोत्तर प्रदेश में निवास करती थी। इस जाति का सम्बन्ध चीन की यू-ची जाति की शाखा से था। कैडफिसीस प्रथम (अथवा कुजुलकदफिसीस) कुषाण वंश का प्रथम शासक था। कुषाण वंश का सर्वाधिक प्रतापी राजा कनिष्क था, जो 78 ई. में शासक बना। कनिष्क का साम्राज्य मध्य एशिया से सारनाथ तक विस्तृत था तथा पुरुषपुर (पेशावर) उसकी राजधानी थी।

राजतरंगिणी के अनुसार कनिष्क का कश्मीर पर अधिकार था। कनिष्क बौद्ध विद्वान अश्वघोष के सम्पर्क में आया, जिसके प्रभाव से उसने बौद्ध धर्म अपना लिया। कनिष्क के काल में कुण्डल वन (कश्मीर) में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगति में
त्रिपिटकों पर टीकाएं लिखी गईं तथा इन्हें एक ग्रन्थ ‘महाविभाष’ में संकलित किया गया। कनिष्क के समय में बौद्ध धर्म स्पष्टतः दो सम्प्रदायों हीनयान व महायान में विभक्त हो गया था।

कनिष्क साहित्य एवं कला का आश्रयदाता था। उसकी राजसभा में बुद्धचरित व सौदरानन्द काव्यों के लेखक अश्वघोष, शून्यवाद तथा सापेक्षवाद के प्रवर्तक एवं प्रकाण्ड विद्वान नागार्जुन, पार्श्व तथा वसुमित्र रहते थे। आयुर्वेद के जन्मदाता एवं’चरक संहिता’ के लेखक चरक को भी कनिष्क ने ही आश्रय दिया था। कनिष्क के काल में ‘गान्धार’ व ‘मथुरा’ कला शैलियों का विकास हुआ। शक संवत् (78 ई. में) का प्रचलन कनिष्क द्वारा ही किया गया। कुषाण शासक पहले शासक थे, जिन्होंने भारत में सोने के सिक्के ढलवाए। विम कैडफिसिस सोने के सिक्के चलाने वाला (नियमित रूप से) पहला भारतीय शासक था।

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