About For Human Digestive System In Hindi

यहां हम आपके लिए सामान्य विज्ञान के महत्वपूर्ण भाग का जिव विज्ञानं का टॉपिक Human Digestive System: Organs, Functions and How It Works In Hindi मानव पाचन तंत्र: अंग, कार्य और कैसे यह काम करता है के बारे में सम्पूर्ण जानकारी लेकर आए हैं, जो आपके जीवविज्ञान के इस टॉपिक मानव पाचन तंत्र: अंग, कार्य और कैसे यह काम करता है को पूरी तरह से पढ़ने और समझने में आपकी बहुत मदद करेगा |

इसके साथ ही इसमें आपको जीव विज्ञान और अन्य सभी परीक्षाओं जैसे एसएससी या यदि आप यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं, और एलडीसी, एनटीपीसी, नेवी, एयरफोर्स, एनडीए जैसी कई अन्य परीक्षाओं के सभी महत्वपूर्ण विषय रहता हे तो आप आराम से इसे पढ़कर तैयारी कर सकते हे । और अन्य सभी परीक्षाओं में आते हैं तो उनमें आने वाले जीव विज्ञान के मानव शरीर के अंग तंत्र के प्रश्नों को आप यहां आसानी से पढ़ सकते हैं और एक-एक को समझ सकते हैं।

शरीर के भीतर ऐसे अंगों के कई समूह हैं जो एक-दूसरे से जुड़े हैं या एक-दूसरे पर निर्भर हैं और एक साथ मिलकर सामूहिक रूप में कार्य करते हैं। समान क्रिया वाले सहयोगी अंगों के इस समूह को तंत्र (System) कहा जाता है।

मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System ) : अंग, कार्य और कैसे यह काम करते हे :-

 पाचन तंत्र (Digestive system)
1. मुखगुहा

2. ग्रास नली

3. आमाशय

4. आँत – छोटी आँत (Small intestine )  (b) बड़ी आँत (Large intestine ) 

5. यकृत (Liver)

6. पित्ताशय (Gall bladder)

7. अग्न्याशय (Pancreas) 

8. अवशोषण (Absorption)

1. पाचन तंत्र (Human Digestive System) System of Human Body :-

भोजन में उपस्थित जटिल पोषक पदार्थों (कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन) का समायोजन पोषक पदार्थों के बड़े-बड़े अणुओं के बीच निर्जलीकरण बंधों से होता है। वे जल से प्रतिक्रिया करके छोटी-छोटी इकाइयों में टूट जाते हैं, जिन्हें शरीर खाने योग्य बनाता है। यह पूरी प्रक्रिया पाचन कहलाती है। पाचन (Digestion) में ठोस, जटिल, बड़े-बड़े अघुलनशील अणुओं का विभिन्न एन्जाइमों द्वारा तथा विभिन्न रासायनिक क्रियाओं द्वारा तरल, सरल और छोटे-छोटे घुलनशील अणुओं में निम्नीकरण होता है। पाचन क्रिया में भाग लेने वाली प्रणाली को पाचन तंत्र कहते हैं।

मनुष्य का पाचन तंत्र निम्नलिखित है: मनुष्य का पाचन तंत्र दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:

A. आहार नाल (Alimentary canal) और B. सम्बद्ध पाचन ग्रन्थियाँ (Associated digestive glands)।

A. आहारनाल: मानव या किसी भी कशेरुकी जन्तु की आहारनाल एक लम्बी, कुण्डलित नलिका है जो मुख (मुंह) से शुरू होकर गुदा (गुदा) में समाप्त होती है।

मनुष्य के आहारनाल में निम्नलिखित प्रमुख भाग शामिल हैं:

1. मुखगुहा, 2. ग्रास नली, 3. आमाशय, 4. आँत

1. मुखगुहा:- मुखगुहा, आहारनाल का पहला हिस्सा है। मनुष्य का मुख दोनों जबड़ों के बीच में एक दरार में खुलता है, जिसे मुखगुहा कहते हैं। “तालू” मुखगुहा का ऊपरी भाग है। मनुष्य के ऊपरी और निचले जबड़े मुखगुहा को घेरते हैं। मुखगुहा के दो होंठ हैं: ऊपरी और निचले। मुखगुहा में दाँत और जीभ हैं।

2. ग्रास नली:- मुखगुहा से लार से सना हुआ भोजन निगल द्वार (Gullet) से ग्रासनली में पहुँचता है। ग्रासनली आमाशय में खुलने वाली एक लम्बी नली है। इसकी दीवार पेशीय है और संकुचनीय है। क्रमाकुंचन (Peristalsis) होता है जब भोजन ग्रासनली की दीवार में फैलता है और तुरंग की तरह सिकुड़ता है। भोजन इसी तरह धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकता है। ग्रासनली में पाचन प्रक्रिया नहीं होती है। भोजन ग्रासनली से आमाशय में जाता है।

3. अमाशय:- उदरगुहा में आमाशय बायीं ओर है। यह द्विपालिका थैली की तरह बना है। इसकी लंबाई लगभग ३० सेमी है। आमाशय का अग्रभाग कार्डिएक है, जबकि पिछला भाग पाइलोरिक है। फुण्डिक (Fundic) कार्डिएक और पाइलोरिक के बीच का भाग है। आमाशय की भीतरी दीवार पर, आहार-नाल के अन्य हिस्सों की तरह, स्तम्भाकार एपिथीलियम कोशिकाओं का स्तर होता है। कोशिकाओं में यह स्तर धँसा रहता है। आमाशय ग्रन्थि या जठर ग्रन्थि इन धँसे भागों की कोशिकाओं से बनती है। ये ग्रन्थियाँ आमाशय में जठर रस निकालती हैं।

जठर ग्रन्थियों में तीन प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं:-

1) श्लेष्मा कोशिकाएँ; 2) भित्तीय या अम्लजन कोशिकाएँ; और (3) मुख्य या जाइमोजिन कोशिकाएँ।

इन तीनों प्रकार की कोशिकाओं का एकत्रित स्राव जठर रस कहा जाता है। जठर रस में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, म्यूकस या श्लेष्मा और निष्क्रिय पेप्सिनोजेन होता है। Oxyntic cells, या अम्लजन कोशिकाएँ, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का उत्पादन करती हैं। निष्क्रिय पेरिसनोजेन को सक्रिय पेप्सिन (Pepsin) नामक एन्जाइम में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बदलता है। भोजन के प्रोटीन को पेप्सिन में बदल देता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल जीवाणुनाशक की तरह भी काम करता है, जो भोजन से जुड़े जीवाणुओं को मार डालता है। म्यूकस कोशिकाएं म्यूकस का स्राव करती हैं। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और पेप्सिन एन्जाइम आमाशय की दीवार और जठर ग्रन्थियों को बचाते हैं। काइम आमाशय के पाइलोरिक छिद्र से छोटी आँत में प्रवेश करता है।

4. आँत (Intestine) : मनुष्य के सम्पूर्ण आँत को दो भागों में विभाजित किया गया है—

(a) छोटी आँत (Small intestine ) तथा (b) बड़ी आँत (Large intestine ) ।

(a) छोटी आँत:- ग्रहणी या पक्वाशय (Duodenum) इसका पहला भाग है, जो अंग्रेजी के अक्षर ‘U’ की तरह मुड़ा हुआ है। ग्रहणी लगभग २५ सेमी लंबा होता है, और उसका अतिरिक्त ३० सेमी लम्बा हिस्सा इलियम कहलाता है। आन्त्र रसांकुर, या गुर्दे की दीवार की भीतरी सतह पर अंगुलियों के समान रचनाएँ पाई जाती हैं। ये रसांकुर आँत की दीवार की अवशोषण सतह बढ़ाते हैं। अग्न्याशय ग्रहणी और आमाशय के मोड़ के मध्य में है। सामान्य वाहिनी अग्न्याशय वाहिनी और पित्ताशय वाहिनी से मिलकर बनती है। यह एक आम वाहिनी ग्रहणी में खुलता है। बड़ी आँत की ओर छोटी आँत खुलती है। छोटी आँत भोजन के पाचन में सहायता करती हैं और पचे हुए भोजन को अवशोषित करती हैं। आहारनाल का सबसे लम्बा भाग छोटी आँत होता है। आहारनाल के इसी हिस्से में पाचन पूरा होता है। मनुष्य में इसकी चौड़ाई 2.5 सेमी और लम्बाई लगभग 6 मीटर होती है।

(b) बड़ी आँत:- बड़ी आँत छोटी आँत में आहारनाल का अगला हिस्सा खुलता है। बड़ी आँत भी दो हिस्सों में बंटी हुई है। इन दो भागों को कोलोन (Colon) और मलाशय (Rectum) कहा जाता है। सीकम (Caecum) छोटी आँत और बड़ी आँत के जोड़ पर होता है। सीकम के शीर्ष पर एक अंगुली जैसी रचना है, जिसमें सिरा बंद है।

यकृत:- मानव शरीर में यह सबसे बड़ी ग्रन्थि है। 1.5 से 2.0 किग्रा के बीच वजन है। यह पेट के ऊपरी हिस्से में दाहिनी ओर है। यह गहरे धूसर है। यह एक गहरे गर्त से दो भागों में विभाजित है। Gal-bladder, या नाशपाती के आकार की एक छोटी-सी थैली, इसके निचले भाग में होती है। पित्ताशय में ही यकृत द्वारा स्रावित पित्त रस (बील) संचित होता है। यह पित्त आँत में एन्जाइमों को बढ़ाता है। इसके अलावा, यह यकृत में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा (वसा) के उपापचय में भी भाग लेता है और शरीर में होने वाले जीवविषों (टॉक्सिन) को दूर करता है।

1. यकृत का कार्य कार्बोहाइड्रेट उपापचय में, यकृत ग्लाइकोजिन बनाता है और संभालता है।
2. भोजन में वसा की कमी होने पर यकृत कार्बोहाइड्रेट का कुछ हिस्सा वसा में बदल देता है।
3. प्रोटीन उपापचय में यकृत सक्रिय है। प्रोटीन का विघटन शरीर के अवयवों में जल, CO, यूरिया (Urea), अमोनिया (Ammonia) और यूरिक अम्ल (Uric Acid) आदि बनाता है। यकृत (Liver) अमोनिया को यूरिया में बदल देता है, जो एक विषैला पदार्थ है। यकृत भी प्रोटीन का अधिकांश भाग कार्बोहाइड्रेट में बदल देता है।

4. आम तौर पर—बड़ी आँत में प्रोटीन के पूतीभवन (Putrefication) से कुछ विषैले पदार्थ निकलते हैं, जो रक्त निर्वाहिका शिरा से यकृत में प्रवेश करते हैं। इन विषैले पदार्थों को यकृत द्वारा अविषैले यौगिकों में बदलकर प्रभावहीन कर दिया जाता है, जो मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकल जाते हैं। यकृत के नीचे स्थित पित्ताशय एक नाशपाती के आकार की थैली है। यकृत पित्त नलिका से जुड़ा हुआ है। पित्त-नलिका पक्वाशय में पित्त बनता है। प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा पित्त का पक्वाशय में गिरना होता है।

पित्ताशय : यह पीला क्षारीय द्रव है। इसका pH 7.7 है। 85% जल, 12% पित्त वर्णक, 0.7% पित्त लवण, 0.28% कोलेस्ट्रॉल, 0.3% मध्यम वसाएँ और 0.15% लेसीथिन होते हैं।

पित्त में कोई एन्जाइम नहीं पाया जाता है। इसकी प्रकृति क्षारीय होती है। यह काइम की चर्बी को जल के साथ मिलाकर इमल्शन बनाने में सहायता करता है। मनुष्य में प्रतिदिन लगभग 700-1000 मिली लीटर पित्त बनता है। पित्त भोजन के साथ आये हानिकारक जीवाणुओं को भी नष्ट करता है। पित्त में उपस्थित अकार्बनिक लवण आमाशय से आये भोजन का माध्यम क्षारीय कर देता है जिससे कि अग्न्याशयी रस (Pancreatic Juice) क्रिया कर सके।

पित्त आँत की क्रमाकुंचन गतियों को बढ़ाता है जिससे भोजन में पाचक रस अच्छी तरह मिल जाते हैं। पित्त अनेक उत्सर्जी एवं विषैले पदार्थों तथा धातुओं के उत्सर्जन का कार्य करता है। यह वसा के अवशोषण में भी सहायक होता है। यह विटामिन K तथा वसाओं में अन्य विटामिनों के अवशोषण में सहायक होता है। यदि यकृत कोशिकाएँ रुधिर से विलिरुबिन लेना बन्द कर दे तो रुधिर द्वारा सम्पूर्ण शरीर में विलिरुबिन फैल जाता है। इसे ही पीलिया (Jaundice) कहते हैं।

(c) अग्न्याशय (Pancreas) :- यह मानव शरीर की दूसरी सबसे बड़ी ग्रन्थि है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि यह एक साथ अन्तःस्रावी (नलिकाविहीन) और बहिःस्रावी (नलिकायुक्त) दोनों प्रकार की ग्रन्थि है । यह छोटी आँत के ‘U’ आकार वाले भाग में स्थित होती है। यह आमाशय के ठीक नीचे तथा ग्रहणी को घेरे हुए पीले रंग की एक ग्रन्थि है ।

अग्नाशय में अनेक पतली-पतली नलिकाएँ होती हैं जो आपस में जुड़कर एक बड़ी अग्न्याशयी वाहिनी (Pancreatic duct) बनाती हैं। अग्न्याशयी वाहिनी तथा मूल पित्तवाहिनी मिलकर एक बड़ी नलिका बनाते हैं, फिर यह नलिका एक छिद्र के द्वारा ग्रहणी में खुलती है। अग्न्याशय एक प्रकार का क्लोम रस (Pancreatic juice) स्रावित करता है जो नलिका के माध्यम से पक्वाशय में आ जाता है।

अग्न्याशय का एक भाग ‘लैंगरहैंस की द्विपिका’ (Islets of Langerhans) कहलाता है। लैंगरहैंस की द्विपिका के B-कोशिका से इन्सुलिन (Insulin), a-कोशिका से ग्लूकेगॉन (Glucagon) एवं Y-कोशिका से सोमेटोस्टेटिन (Somatostatin) नामक हार्मोन निकलता है। इन्सुलिन रक्त में शर्करा की मात्रा को निर्धारित करने का काम करता है। इन्सुलिन के अल्पस्रवण से मधुमेह (Diabetes) नामक रोग हो जाता है।

अग्न्याशयी रस (Pancreatic juice):- यह अग्न्याशयी कोशिकाओं से स्रावित होता है। इसमें 98% जल तथा शेष 2% भाग में लवण एवं एन्जाइम होते हैं। यह क्षारीय द्रव होता है जिसका pH मान 7.5-8.3 होता है। अग्न्याशयी रस में तीनों प्रकार मुख्य भोज्य पदार्थों को पचाने के एन्जाइम होते हैं। इस कारण इसे ‘पूर्ण पाचक रस’ कहा जाता है। इसमें मुख्यतः पाँच एन्जाइम-ट्रिप्सिन, एमाइलेज, कार्बोक्सिपेप्टिडेस, लाइपेज तथा माल्टेज पाये जाते हैं। इसमें माल्टेज एवं एमाइलेज कार्बोहाइड्रेट का, ट्रिप्सिन प्रोटीन का तथा लाइपेज वसा का पाचन करता है।

मनुष्य में पाचन क्रिया (Human Digestive System):-

मनुष्य में भोजन का पाचन मुख से शुरू होकर छोटी आँत तक चलता है। भोजन को मुख में खाने के बाद दाँतों से अच्छी तरह पीसा और चबाया जाता है, जिससे वह छोटे कणों में बूट जाता है। मुख में स्थित लार ग्रन्थियों (Saliva) द्वारा स्रावित लार (Saliva) से दाँतों द्वारा पीसा भोजन आसानी से मिलता है। लार में दो एन्जाइम हैं: टायलिन और लाइसोजाइम।

टायलिन भोजन में मौजूद मंड, या स्टार्च को माल्टोज शर्करा में बदल देता है; इसके बाद, माल्टेज नामक एक एन्जाइम माल्टोज शर्करा को ग्लूकोज में बदल देता है। भोजन में मौजूद घातक जीवाणुओं को लाइसोजाइम नामक एन्जाइम नष्ट करता है। साथ ही लार में उपस्थित अन्य पदार्थ बफर का काम करते हैं। जीभ अब भोजन को ग्रसिका में ठेल देता है, जहाँ से यह आमाशय में पहुँचता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCI) भोजन से मिलकर आमाशय में टायलिन को निष्क्रिय कर देता है। साथ ही यह भोजन को अधिक अम्लीय बनाता है।

हाइड्रोक्लोरिक अम्ल भोजन में हानिकारक जीवाणुओं को भी मार डालता है। आमाशय में पहुँचने पर भोजन जठर रस से मिलकर अर्द्धतरल लुगदी बन जाता है। जठर रस में म्यूसिन, रेनिन और पेप्सिन नामक एन्जाइम होते हैं। भोजन में प्रोटीन को पहले प्रोटियोजेज में बदलकर पेप्टोन में बदलता है। दूध में घुलनशील प्रोटीन केसीन (Casein) को रेनिन ने कैल्सियम पैराकैसिनेट में बदलकर दही बनाता है।

जठर रस के अम्लीय प्रभाव को म्यूसिन कम करता है। यह भोजन को चिकना करता है और श्लेष्मा झिल्ली पर एक सुरक्षा आवरण बनाता है, जिससे पाचक एन्जाइमों को आहारनाल पर असर नहीं होता। आमाशय में इसके बाद भोजन को “काइम” कहा जाता है। आमाशय से काइम ग्रहणी में पहुँचता है। यहाँ इसमें पहले यकृत से स्रावित पित्त रस मिलता है, जिसे बील रस कहा जाता है। पित्त रस में कोई एन्जाइम नहीं पाया जाता है।

यह क्षारीय होता है, जिससे काइम अम्लीय से क्षारीय हो जाता है। यह काइम की चर्बी को जल से मिलाकर इमल्शन बनाने में मदद करता है। यहाँ काइम में अग्न्याशय से स्रावित अग्न्याशय रस भी आता है। अग्न्याशय रस में ट्रिप्सिन (Trypsin), लाइपेज (Lipase), एमाइलेज (Amylase), कोर्बोक्सिपेप्टिडेस (Carboxypeptidase) तथा माल्टेज नामक एन्जाइम होते हैं। ट्रिप्सिन पेप्टोन और प्रोटीन को पॉलीपेप्टाइड्स और ऐमीनो अम्ल में बदलता है।

एमाइलेज मंड को घुलनशील शर्करा में बदलता है। लाइपेज इमल्सीकृत वसाओं को फैटी एसिड्स और ग्लिसरीन में बदल देता है। इन एन्जाइमों की क्रिया काइम पर होने से काइम काफी तरल हो जाता है और फिर इलियम में जाता है। यहाँ आन्त्ररस (पेट का रस) काइम पर काम करता है। आन्त्र रस क्षारीय है (pH-8)। दैनिक रूप से एक स्वस्थ व्यक्ति में लगभग दो लीटर आन्त्र रस स्रावित होता है।

आन्त्ररस में निम्नलिखित प्रकार के एन्जाइम उपस्थित होते हैं—

1. इरेप्सिन (Erepsin): यह शेष प्रोटीन एवं पेप्टोन को ऐमीनो अम्ल में परिवर्तित करता है।
2. माल्टेज (Maltase): यह माल्टोस को ग्लूकोज शर्करा में परिवर्तित करता है।
3. सुक्रेस (Sucrase) : यह सुक्रोस को ग्लूकोज एवं फ्रक्टोज में परिवर्तित करता है।
4. लेक्टेस (Lactase) : यह लैक्टोज को ग्लूकोज एवं ग्लेक्टोस में परिवर्तित करता है।
5. लाइपेज (Lipase): यह इमल्शीकृत वसाओं को ग्लिसरीन एवं फैटी एसिड्स में परिवर्तित करता है।

अवशोषण (Absorption):- छोटी आँत तक भोजन का पूर्ण पाचन हो जाता है अर्थात् भोज्य पदार्थ यहाँ इस रूप में परिवर्तित हो जाता है कि आहारनाल की दीवार उसे अवशोषित कर सके । काइम के अवशोषण की मुख्य क्रिया छोटी आँत में ही होती है। छोटी आँत में स्थित रसांकुर (Villi) की कोशिकाएँ अवशोषित योग्य तरल काइम को अवशोषित करने के पश्चात् रुधिर एवं लसीका में पहुँचा देती है।

इस प्रकार पचे हुए काइम को ग्लूकोज तथा ऐमीनो अम्ल रुधिर कोशिकाओं में अवशोषित होकर रुधिर मिश्रित हो जाते हैं। लेकिन वसा अम्ल एवं ग्लिसरीन लसीका में अवशोषित होते हैं। इसके बाद ये पदार्थ रुधिर भ्रमण द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों में पहुँच जाते हैं।बिना पचा काइम (Undigested chyme) छोटी आँत से बड़ी आँत में पहुँच जाता है। बड़ी आँत काइम से जल को अवशोषित कर लेती है। शेष काइम मल के रूप में मलाशय (Rectum) में एकत्रित होकर गुदा (Annus) द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

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